(कवित्त)
कीरति महारानी, वृषभानु आदि गोपी गोप,
कैसे या कलि माँहि धन्यकहलावते। [1]
कौन तप करतो या व्रज माहि बसिवे को,
कौन सो बैकुंठ हूके सुख विसरावते॥ [2]
नागरिया जोपे राधे प्रगट हूँ होती नाहिं,
श्याम पर काम हूँके विपती कहावते। [3]
छाय जाती जड़ता विलाय जाते कविसब,
जरजातो रस तो रसिक कहा गावते॥ [4]
- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, श्री प्रियाजी के जन्मोत्सव के कवित्त (11)
यदि श्री राधा ब्रज में प्रकट नहीं होती तो महारानी कीर्ति एवं महाराज वृषभानु जी समेत समस्त गोप और गोपियां इस कलयुग में भी कैसे धन्य कहलाए जाते। [1]
यदि श्री राधा ब्रज में प्रकट नहीं होती तो ब्रज में वास करने के लिए भला कौन तपस्या करता ? ब्रजवास के सुख के लिए वैकुण्ठ के सुख का भी कौन त्याग करता ? [2]
अगर श्री राधा ब्रज धाम में प्रकट नहीं होती तो औरों की कौन कहे स्वयं श्यामसुंदर भी काम से पीड़ित हो जाते। [3]
समस्त चराचर जगत मे से चैतन्य शक्ति विलुप्त हो जाती और जड़ता छा जाती एवं समस्त कविजन विलुप्त हो जाते। इतना ही नहीं, श्री राधा के न प्रकट होने से, त्रिगुण एवं त्रिगुणातीत जगत से रस जल कर समाप्त हो जाता तो रसिक जन क्या गाते एवं ब्रह्मांड को कैसे रस में डुबाते। समस्त चराचर जगत नीरस हो जाता। [4]
कीरति महारानी, वृषभानु आदि गोपी गोप,
कैसे या कलि माँहि धन्यकहलावते। [1]
कौन तप करतो या व्रज माहि बसिवे को,
कौन सो बैकुंठ हूके सुख विसरावते॥ [2]
नागरिया जोपे राधे प्रगट हूँ होती नाहिं,
श्याम पर काम हूँके विपती कहावते। [3]
छाय जाती जड़ता विलाय जाते कविसब,
जरजातो रस तो रसिक कहा गावते॥ [4]
- श्री नागरीदास जी, श्री नागरीदास जी की वाणी, श्री प्रियाजी के जन्मोत्सव के कवित्त (11)
यदि श्री राधा ब्रज में प्रकट नहीं होती तो महारानी कीर्ति एवं महाराज वृषभानु जी समेत समस्त गोप और गोपियां इस कलयुग में भी कैसे धन्य कहलाए जाते। [1]
यदि श्री राधा ब्रज में प्रकट नहीं होती तो ब्रज में वास करने के लिए भला कौन तपस्या करता ? ब्रजवास के सुख के लिए वैकुण्ठ के सुख का भी कौन त्याग करता ? [2]
अगर श्री राधा ब्रज धाम में प्रकट नहीं होती तो औरों की कौन कहे स्वयं श्यामसुंदर भी काम से पीड़ित हो जाते। [3]
समस्त चराचर जगत मे से चैतन्य शक्ति विलुप्त हो जाती और जड़ता छा जाती एवं समस्त कविजन विलुप्त हो जाते। इतना ही नहीं, श्री राधा के न प्रकट होने से, त्रिगुण एवं त्रिगुणातीत जगत से रस जल कर समाप्त हो जाता तो रसिक जन क्या गाते एवं ब्रह्मांड को कैसे रस में डुबाते। समस्त चराचर जगत नीरस हो जाता। [4]

