(सवैया)
नवनीत गुलाब से कोमल हैं, 'हठी' कंज की मंजुलता इनमें। [1]
गुललाला गुलाब प्रबाल जपा, छबि ऐसी न देखी ललाईन में॥ [2]
मुनि मानस मंदिर मध्य बसै, बस होत है सूधै सूभाईन में। [3]
रहुरे मन तू चित चाइन सों, वृषभानु किशोरी के पायन में॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (49)
श्री राधा के चरण नवनीत (मक्खन) और गुलाब से भी कोमल हैं, और इनमें कमल की सुंदरता जैसी मोहकता है। [1]
उन चरणों की अरुणिमा ऐसी है, जो न गुलाल, न गुलाब, न प्रवाल और न ही जपा-पुष्प में देखने को मिलती है। [2]
अनन्य रसिकों के हृदय-मंदिर में इन चरणों की छवि सदा विराजमान रहती है, जहाँ उनकी शोभा निरंतर बढ़ती रहती है। [3]
अरे मन! तू दृढ़ भाव से अपने चित्त को सदा वृषभानु-दुलारी श्री राधा के चरणों में ही स्थिर कर दे— यही मेरी तुझसे विनती है। [4]
नवनीत गुलाब से कोमल हैं, 'हठी' कंज की मंजुलता इनमें। [1]
गुललाला गुलाब प्रबाल जपा, छबि ऐसी न देखी ललाईन में॥ [2]
मुनि मानस मंदिर मध्य बसै, बस होत है सूधै सूभाईन में। [3]
रहुरे मन तू चित चाइन सों, वृषभानु किशोरी के पायन में॥ [4]
- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (49)
श्री राधा के चरण नवनीत (मक्खन) और गुलाब से भी कोमल हैं, और इनमें कमल की सुंदरता जैसी मोहकता है। [1]
उन चरणों की अरुणिमा ऐसी है, जो न गुलाल, न गुलाब, न प्रवाल और न ही जपा-पुष्प में देखने को मिलती है। [2]
अनन्य रसिकों के हृदय-मंदिर में इन चरणों की छवि सदा विराजमान रहती है, जहाँ उनकी शोभा निरंतर बढ़ती रहती है। [3]
अरे मन! तू दृढ़ भाव से अपने चित्त को सदा वृषभानु-दुलारी श्री राधा के चरणों में ही स्थिर कर दे— यही मेरी तुझसे विनती है। [4]

