आधाय मूर्द्धनि यदापुरुदारगोप्यः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (4)

आधाय मूर्द्धनि यदापुरुदारगोप्यः - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (4)

आधाय मूर्द्धनि यदापुरुदारगोप्यः काम्यं पदं प्रियगुणैरपि पिच्छमौलेः।
भावोत्सवेन भजतां रसकामधेनुं तं राधिका चरणरेणुमहं स्मरामि॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (4)

उदार गोपियों ने जिस चरण-धूलि को मस्तक पर चढ़ाकर मोरमुकुट वाले श्यामसुन्दर के लिए भी कामना करने योग्य पद (श्रीप्रियाजी के दास्यभाव की पदवी) को प्रिय गुणों के साथ प्राप्त किया, भाव चाव से भजने वालों के लिए रस की कामधेनु के समान उन श्रीराधा के चरणों की धूलि का मैं स्मरण करता हूँ।