(राग गौरी)
जय जय श्री वृन्दावन चन्द ।
महारूप सुखरासि छवीले, नित ही विहरत आनंद-कंद ।।
जामें वसि जे अनंत देत चित, तेई हैं मति-मंद ।
रसिकसिरोमनि श्री हरिदासी, कीने सहज प्रेम के फंद ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (50)
वृंदावन धाम की जय जय हो जहां नित्य ही महा प्रेम सुख राशि स्वरूप छबीले आनंद कंद श्री राधा कृष्ण विहार करते हैं। जो ऐसे सुख स्वरूप श्री वृंदावन धाम में निवास करके भी अपने चित्त को श्री दिव्य युगल राधा कृष्ण में नहीं लगाते एवं प्रपंच में ले जाते हैं वह मूर्ख हैं। श्री ललित किशोरी कहते हैं कि रसिक शिरोमणि ललिता अवतार श्री हरिदास जी महाराज जी की कृपा से सहज ही यह दिव्य प्रेम रस प्राप्त होता है।
जय जय श्री वृन्दावन चन्द ।
महारूप सुखरासि छवीले, नित ही विहरत आनंद-कंद ।।
जामें वसि जे अनंत देत चित, तेई हैं मति-मंद ।
रसिकसिरोमनि श्री हरिदासी, कीने सहज प्रेम के फंद ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (50)
वृंदावन धाम की जय जय हो जहां नित्य ही महा प्रेम सुख राशि स्वरूप छबीले आनंद कंद श्री राधा कृष्ण विहार करते हैं। जो ऐसे सुख स्वरूप श्री वृंदावन धाम में निवास करके भी अपने चित्त को श्री दिव्य युगल राधा कृष्ण में नहीं लगाते एवं प्रपंच में ले जाते हैं वह मूर्ख हैं। श्री ललित किशोरी कहते हैं कि रसिक शिरोमणि ललिता अवतार श्री हरिदास जी महाराज जी की कृपा से सहज ही यह दिव्य प्रेम रस प्राप्त होता है।

