वृन्दावनस्य संयोगात् पुनस्त्वं तरुणी नवा - पद्म पुराण, भागवत माहात्म्य (1.61)

वृन्दावनस्य संयोगात् पुनस्त्वं तरुणी नवा - पद्म पुराण, भागवत माहात्म्य (1.61)

वृन्दावनस्य संयोगात् पुनस्त्वं तरुणी नवा।
धन्यं वृन्दावनं तेन भक्तिर्नृत्यति यत्र च॥

- पद्म पुराण, भागवत माहात्म्य (1.61)

श्री नारद जी कहते हैं “हे भक्ति, धन्य है ऐसे वृंदावन को, जहाँ पहुँचने पर आपको नव तारुण्य प्राप्त हुआ एवं जहाँ गली-गली घर-घर और प्रत्येक प्राणी के हृदय में ही नहीं, प्रत्येक लता पता की डार और पत्रों पर आप नृत्य कर रहीं हैं।”