हमारी जीवनि जुगलकिशोर - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.5)

हमारी जीवनि जुगलकिशोर - श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.5)

हमारी जीवनि जुगलकिशोर।
कुंजबिहारिनि कुंजबिहारी, नित नव जीवन जोर॥
भूल न जाउँ पलक कहुँ, इत उत, रहौं निरंतर पासा।
दंपति संपति दिन दुलराऊँ, और न दूजी आसा॥
रूपमाधुरी, दृगन पियाऊँ, स्रवन रसीली बानी।
अंग संग, उद्गार नासिका, तीनौं ताप सिरानी॥
असन करौं उच्छिष्ट दुहुँन कौ, भूसन बसन उतारे।
भगवत रसिक मनाय लाडिली, करौं लाल दृग तारे॥

- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (5.5)

भावार्थ: भगवतरसिक जी कहते हैं कि नित्य नवीन यौवन के जोर से निरंतर प्रेमान्मत्तत रहने वाले जुगल किशोर - श्री कुंजबिहारी एवं श्रीकुंजबिहारिणी की जोड़ी ही हमारी प्राण संजीवनी है। हम भूलकर भी कभी, एक पल के लिए भी इन्हें छोडकर इधर उधर नहीं भटकते। सदा इनके पास ही उपस्थित रहते हैं। चाहते भी यही हैं कि हम नव दंपत्ति स्वरूप इस अद्भुत संपत्ति की सार संभाल ही दिन भर करते रहें। इसके अतिरिक्त हमारी और कोई अभिलाषा नहीं है।
भगवतरसिक जी कहते हैं कि हम अपने नयनों को प्रिया प्रियतम की रूप माधुरी का पान कराते रहते हैं। श्रवणों को इनकी रसीली वचनावली से आनंदित करते रहते हैं। त्वचा को इनके अंग संग से स्पर्श का सुख मिलता है, नासिका को इनके अंगों से निकलने वाली दिव्य सुगंध से अप्यायित रखते है और रसना को इनका उच्छिष्ट (प्रसादी) प्रदान करके सुख पहुँचाते हैं। (इस प्रकार हमारी पांच ज्ञानेन्द्रियाँ निरंतर लोकोत्तोर आनंद का अनुभव करती रहती हैं।) इसके साथ साथ हम मानवती लाडलीजी को मना मना कर अपने को लालजी की आँख का तारा बनाये रखते हैं ।