बने दोउ रसिक बिहारी बिहारनी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (58)

बने दोउ रसिक बिहारी बिहारनी - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (58)

(दोहा)
सिंहासन श्रीहरिप्रिया, सोहत सुढर ढरे।
रसिक बिहारी बिहारनी, दोउ गुन रूप भरे॥

(पद)
बने दोउ रसिक बिहारी बिहारनी रूप भरे गुन भरे।
अंग अंग सोहें रंग भीने अभरन रतन जरे॥
पहरें बसन सुबरनी छबि मनहरनी ढरनि ढरे।
श्रीहरिप्रिया बैठे सिंहासन निरखति नैन ठरे॥

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, सेवा सुख (58)

(दोहा)
श्रीहरि और श्रीप्रिया, मानों सौन्दर्य के साँचे में ढले हुए एक दिव्य सिंहासन पर सुशोभित हैं। ये रसिक-बिहारी और बिहारिनी रूप-माधुरी एवं समस्त गुणों की खान हैं।

(पद)
ये दोनों रसिक बिहारी बिहारनि रूप तथा समस्त गुणों से भरपूर हैं। इनके अंग प्रत्यंग अनुराग रंग से रंजित हैं और ये रत्न जड़ित आभूषण पहने हुए हैं। सुन्दर रंग-बिरंगे वस्त्रों को धारण किये हुए इनकी छबि सब के मनों को हरण करने वाली है। मानों यह किसी अनिर्वचनीय सुन्दरता रूपी साँचे में ढले हुए हों। श्रीहरि एवं प्रिया इस समय सिंहासन पर बैठे हुए परस्पर ढरारे नेत्र कमलों से देख रहे हैं।