वृन्दावन में जो कबहूँ, भजन कछू नहिं होय।
रज तो उड़ि लागै तनहिं, पीवै जमुना तोय॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (53)
श्री वृन्दावन में वास करते हुए यदि कुछ भी भजन न हो, तो भी देव-मुनियों के लिए दुर्लभ श्री वृन्दावन की रज तो उड़कर देह को लगेगी ही। पीने को परम-पावन श्री यमुना-जल भी अवश्य मिलेगा।
रज तो उड़ि लागै तनहिं, पीवै जमुना तोय॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (53)
श्री वृन्दावन में वास करते हुए यदि कुछ भी भजन न हो, तो भी देव-मुनियों के लिए दुर्लभ श्री वृन्दावन की रज तो उड़कर देह को लगेगी ही। पीने को परम-पावन श्री यमुना-जल भी अवश्य मिलेगा।

