जाके मन बसै वृंदावन - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (174)

जाके मन बसै वृंदावन - श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (174)

(राग सारंग एवं रामकली)
जाके मन बसै वृंदावन।
सोई रसिक अनन्य धन्य, जाकैं हितराधामोहन॥
ताही नित्य विहार फुरै वन, लीलाकौ अनुकरन।
विषय वासना नाँहिन जाकैं, सुधरे अंतहकरन॥
लोक वेदकौ भेद न जाकैं, श्रीभागवत सो धन।
ताकैं व्यास रास रस वरषत, बहिगई कामिनि कंचन॥

- श्री हरिराम व्यास (विशाखा अवतार) - व्यास वाणी, पूर्वार्ध (174)

जिन महानुभावों का चित्त, श्री धाम वृंदावन एवं श्री राधा कृष्ण से जुड़ गया है, वे रसिक जन धन्य है। जो रसिक महापुरुष विषय वासना से रहित हैं एवं जिनका अंतः करण निर्मल हो चुका है, उन्हीं के ह्रदय में नित्य बिहार रस का प्रकाश होता है एवं नित्य बिहार लीलाओं की स्फुर्णा होती हैं। श्री हरिराम व्यास जी कह रहे हैं “जिनको लोक लाज का भय नहीं, जिनको वेदों की मर्यादा का भय नहीं एवं जिनकी भेद बुद्धि समाप्त हो गयी है, उन्हीं के हृदय में महारास के दिव्य रस की वर्षा होती है और उस रस से कीर्ति, कामिनी एवं कंचन हृदय से बह कर बाहर निकल जाते हैं।”