निर्विद्य कृत्वाद्यखिलात् कदाहंच्छित्वा समस्ताश्च जगत्यपेक्षाः।
प्रविश्य वृन्दावनमत्यसङ्गस्तदीशवार्ताभिरहानि नेष्ये॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.97)
समस्त कर्तव्यों से निर्वेद प्राप्त कर एवं जगत् की सकल अपेक्षाओं से रहित होकर मैं कब निःसङ्ग भाव से श्रीवृन्दावन में प्रवेश कर श्रीवृन्दावनेश्वरी एवं श्रीवृन्दावनेश्वर की वार्ताओं में, अर्थात् गुणलीलाओं के श्रवणकीर्तन में, दिन यापन करूंगा?
प्रविश्य वृन्दावनमत्यसङ्गस्तदीशवार्ताभिरहानि नेष्ये॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.97)
समस्त कर्तव्यों से निर्वेद प्राप्त कर एवं जगत् की सकल अपेक्षाओं से रहित होकर मैं कब निःसङ्ग भाव से श्रीवृन्दावन में प्रवेश कर श्रीवृन्दावनेश्वरी एवं श्रीवृन्दावनेश्वर की वार्ताओं में, अर्थात् गुणलीलाओं के श्रवणकीर्तन में, दिन यापन करूंगा?

