आली म्हाँने लागे बृन्दावन नीकौ।
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा
दरसण गोविन्द जी को ॥
निर्मल नीर बहत जमुना में
भोजन दूध दही को।
रतनसिंघासन आप विराजै
मुकट धर्यो तुलसी को॥
कुंजन कुंजन फिरत राधिका
सबद सुणत मुरली को।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर
भजन बिना नर फीको॥
- मीराबाई
हे सखी, मुझे वृंदावन अति प्रिय लगता है। यहाँ हर घर में श्री तुलसी जी विराजमान हैं एवं श्री ठाकुर जी की पूजा होती है एवं नित्य दर्शन होता है। श्री जमुना जी में निर्मल एवं स्वच्छ जल बह रहा है एवं यहाँ पर दूध एवं दही का भोग श्री ठाकुर जी को लगाया जा रहा है। श्री ठाकुर जी रत्न एवं मणियों के सिंहासन पर विराजमान हैं परंतु श्री तुलसी जी के पत्रों से निर्मीत मुकुट धारण किया है। श्री राधिका जी विभिन्न कुंजों में विचरण कर रहीं हैं जहाँ मुरली की मधुर धुन सुनाई दे रही है। श्री मीराबाई कह रहीं हैं "प्रभु श्री गिरिधर नागर के भजन के बिना यह मनुष्य शरीर फीका एवं निरर्थक है।"
घर घर तुलसी ठाकुर पूजा
दरसण गोविन्द जी को ॥
निर्मल नीर बहत जमुना में
भोजन दूध दही को।
रतनसिंघासन आप विराजै
मुकट धर्यो तुलसी को॥
कुंजन कुंजन फिरत राधिका
सबद सुणत मुरली को।
मीरा के प्रभु गिरधर नागर
भजन बिना नर फीको॥
- मीराबाई
हे सखी, मुझे वृंदावन अति प्रिय लगता है। यहाँ हर घर में श्री तुलसी जी विराजमान हैं एवं श्री ठाकुर जी की पूजा होती है एवं नित्य दर्शन होता है। श्री जमुना जी में निर्मल एवं स्वच्छ जल बह रहा है एवं यहाँ पर दूध एवं दही का भोग श्री ठाकुर जी को लगाया जा रहा है। श्री ठाकुर जी रत्न एवं मणियों के सिंहासन पर विराजमान हैं परंतु श्री तुलसी जी के पत्रों से निर्मीत मुकुट धारण किया है। श्री राधिका जी विभिन्न कुंजों में विचरण कर रहीं हैं जहाँ मुरली की मधुर धुन सुनाई दे रही है। श्री मीराबाई कह रहीं हैं "प्रभु श्री गिरिधर नागर के भजन के बिना यह मनुष्य शरीर फीका एवं निरर्थक है।"

