प्रेम-रस-बोरी भानुदुलार।
रतन जटित सिंहासन राजति, लाजत लखि श्रृंगार।
मणिन-जटित सिर कनक-मुकुट पर, चारू चंद्रिका धार।
लोचन सलज सहज कजरारे, जलज लजावन हार।
झुकि झुकि परत नाक नथ-बेसर, उर मोतिन रिझवार।
कानन करणफूल मणि मंडित, उर मुक्तन-मणि हार।
चुनरी नील नील पट कंचुकि, लहँगा नील निहार।
कर करपत्र चुरी मणि-कंकण, मेंहँदी अरूण सँवार।
पग जावक 'कृपालु' भल पायल, बिछुवनि छवि छविदार।।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (25)
भावार्थ :--
हमारी किशोरी जी प्रेम-रस में सराबोर हैं। जड़े हुए रत्नों से युक्त सिंहासन पर सुशोभित हैं एवं उनकी रूप-माधुरी को देखकर मूर्तिमान श्रृंगार भी लज्जित होता है। मणिमंडित स्वर्ण मुकुट पर चन्द्रिका धारण किये हुए हैं।
लज्जा से युक्त नेत्र स्वाभावतः कजरारे हैं एवं कमल को भी लज्जित करने वाले हैं। नासिका में सुशोभित नथ और बेसर झूम-झूम कर झोंके खा रही हैं।
कान पर्यन्त मोतियों की लड़ का तो कहना ही क्या है। कान में मणियों से जड़े हुए स्वर्ण के कर्णफूल झूल रहे हैं। एंव वक्षःस्थल पर मोतियों तथा मणियों के हार अलंकृत हैं।
नीले रंग की चुनरी ओढ़े हुए हैं, नीले रंग की ही अंगिया पहने ह्रै एवं नीले रंग का ही लहंगा धारण किये हैं।
हाथों में मणियों के कंकण, करपत्र एवं चूड़ियाँ सुशोभित हैं तथा मेहँदी की रचना तो अत्यन्त ही आकर्षक है। 'श्री कृपालु जी' कहते हैं, चरण-कमलों में लाल मिहावर शोभायमान है। पायल पहने हुए हैं तथा अंगुलियों में बिछुओं की छवि तो अनिवर्चनीय ही है।
रतन जटित सिंहासन राजति, लाजत लखि श्रृंगार।
मणिन-जटित सिर कनक-मुकुट पर, चारू चंद्रिका धार।
लोचन सलज सहज कजरारे, जलज लजावन हार।
झुकि झुकि परत नाक नथ-बेसर, उर मोतिन रिझवार।
कानन करणफूल मणि मंडित, उर मुक्तन-मणि हार।
चुनरी नील नील पट कंचुकि, लहँगा नील निहार।
कर करपत्र चुरी मणि-कंकण, मेंहँदी अरूण सँवार।
पग जावक 'कृपालु' भल पायल, बिछुवनि छवि छविदार।।
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, श्रीराधा माधुरी (25)
भावार्थ :--
हमारी किशोरी जी प्रेम-रस में सराबोर हैं। जड़े हुए रत्नों से युक्त सिंहासन पर सुशोभित हैं एवं उनकी रूप-माधुरी को देखकर मूर्तिमान श्रृंगार भी लज्जित होता है। मणिमंडित स्वर्ण मुकुट पर चन्द्रिका धारण किये हुए हैं।
लज्जा से युक्त नेत्र स्वाभावतः कजरारे हैं एवं कमल को भी लज्जित करने वाले हैं। नासिका में सुशोभित नथ और बेसर झूम-झूम कर झोंके खा रही हैं।
कान पर्यन्त मोतियों की लड़ का तो कहना ही क्या है। कान में मणियों से जड़े हुए स्वर्ण के कर्णफूल झूल रहे हैं। एंव वक्षःस्थल पर मोतियों तथा मणियों के हार अलंकृत हैं।
नीले रंग की चुनरी ओढ़े हुए हैं, नीले रंग की ही अंगिया पहने ह्रै एवं नीले रंग का ही लहंगा धारण किये हैं।
हाथों में मणियों के कंकण, करपत्र एवं चूड़ियाँ सुशोभित हैं तथा मेहँदी की रचना तो अत्यन्त ही आकर्षक है। 'श्री कृपालु जी' कहते हैं, चरण-कमलों में लाल मिहावर शोभायमान है। पायल पहने हुए हैं तथा अंगुलियों में बिछुओं की छवि तो अनिवर्चनीय ही है।

