छाँड़ि स्वाद सुख देह के, और जगत की लाज।
मनहिं मारि तन हारी कै, वृंदावन में गाज॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (49)
साधक को चाहिए कि वह लोक-लाज तथा देह के सुख-स्वादादि का त्याग कर तन-मन से दीन होकर वृन्दावन में निर्भय भाव से निवास करे।
मनहिं मारि तन हारी कै, वृंदावन में गाज॥
- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, वृन्दावन शत लीला (49)
साधक को चाहिए कि वह लोक-लाज तथा देह के सुख-स्वादादि का त्याग कर तन-मन से दीन होकर वृन्दावन में निर्भय भाव से निवास करे।

