अलबेली सुकुमारी नैननिं के आगैं रहै - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (45)

अलबेली सुकुमारी नैननिं के आगैं रहै - श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (45)

(कवित्त)
अलबेली सुकुमारी नैननिं के आगैं रहै,
जब लगि प्रीतम के प्रान रहैं तन में। [1]
यहै जिय जानि प्यारी रंचकौ न होति न्यारी,
तिनही के प्रेम-रंग रँगि रही मन में॥ [2]
परम प्रवीन गोरी हाव-भाव में किसोरी,
नये-नये छबि के तरंग उठै छिन में। [3]
'हित ध्रुव' प्रीतम के नैन-मीन रस-लीन,
खेलिबौ करत दिन-प्रति रूप बन में॥ [4]

- श्री ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (45)

जब तक अलबेली कोमलांगिनी प्रिया प्रियतम के सम्मुख रहती हैं, तभी तक ही प्रियतम अपनी देह में प्राणों का अनुभव करते हैं। [1]

इस बात को समझने वाली प्रिया उनसे एक पल के लिए भी वियुक्त नहीं होतीं और निरंतर प्रियतम के प्रेम में ही रँगी रहती हैं। [2]

रस-विदग्धा नागरी प्रिया के मन में हाव-भावपूर्ण नई-नई छवियों की छटाएँ प्रतिक्षण उदित होती रहती हैं। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रियतम के रस-निमग्न नयन रूपी मीन, अहर्निश प्रिया के रूप-जलाशय में नित्य-निरंतर कल्लोल करते रहते हैं। [4]