वृन्दावनैकशरणस्त्यक्तश्रुतिलोकवर्त्मसंचरणः ।
भावाद्धरिचर्णान्तरपरिचरणाद्व्याकुलः कदा नु स्याम् ॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.57)
अहो एक मैं श्रीवृन्दावन की ही शरण ग्रहण करके वेदमार्ग एवं लौकिक समस्त आचरण त्याग कर, कब भावपूर्वक श्रीहरि के चरणों की मानसी सेवा करके मैं व्याकुल होऊंगा।
भावाद्धरिचर्णान्तरपरिचरणाद्व्याकुलः कदा नु स्याम् ॥
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (3.57)
अहो एक मैं श्रीवृन्दावन की ही शरण ग्रहण करके वेदमार्ग एवं लौकिक समस्त आचरण त्याग कर, कब भावपूर्वक श्रीहरि के चरणों की मानसी सेवा करके मैं व्याकुल होऊंगा।

