रँगीली लाड़िली रँगभीने मोहनलाल - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, उत्साह सुख (30)

रँगीली लाड़िली रँगभीने मोहनलाल - श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, उत्साह सुख (30)

(दोहा)
कुंजनि कुंजनि डोलहीं हो, मत्त मराल की चाल।
मूरति प्रेम सिंगार की, रँगभीने दोउ लाल॥

(पद)
रँगीली लाड़िली रँगभीने मोहनलाल।
मूरति प्रेम सिंगार की सोहैं सहज स्वरूप रसाल॥
कुंजनि कुंजनि डोलहीं हो मत्त मराल की चाल।
बात कहत मुसकात जात दोउ दियें भुजा अँकमाल॥
गोरी कंचनबेलि-सी (हो) जोरी स्याम-तमाल।
बसहु निरन्तर (श्री) हरिप्रिया हिय में आनन्द रूपरसाल॥

- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, उत्साह सुख (30)

(दोहा)
तदन्तर, परस्पर अनुराग में सराबोर दोनों—अर्थात् मूर्तिमान प्रेम स्वरूपा श्रीप्रियाजू और साक्षात् श्रृंगार-रस स्वरूप श्रीलालजू—एक-दूसरे के गले में बाँहें डाले हुए एक कुंज से दूसरी कुंज में भ्रमण करने लगे।

(पद)
फिर रंगीली श्री लाडली जू और अनुराग में निमग्न श्री मोहनलाल जो स्वाभाविक ही प्रेम और श्रृंगार की रसीली मूर्तियाँ हैं, एक निकुंज से दूसरी निकुंज में मस्त हँस की चाल से डोलने लगे यह परस्पर गल बहियां दिये हुए चलते चलते बातें करते जाते हैं, और कभी कभी मुस्कराने लगते हैं गोरी प्यारी जू स्वर्ण लता सरीखी और प्यारे श्याम तमाल जैसे प्रतीत होते हैं। श्री हरि प्रिया सखी जी यह चाहती हैं कि यह आनन्द रूप रसाल जोरी सदा मेरे हृदय में ऐसे ही विराजमान रहे।