(राग काफी)
बलि जैहौं श्रीरसिकचारज।
नित्य बिहार उद्धार कियौ जिन, मथि निज हृदय सिन्धु बारज॥
भ्रम, तम, स्रम सब हरे हमारे, कर गहि सकल संभारे कारज।
भगवत रसिक प्रसंसित कीने, स्यामा स्याम सहायक आरज॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (32)
भावार्थ - भगवतरसिकजी कहते हैं - रसिकाचार्य स्वामी श्री हरिदासजी! मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ जिन्होंने अपने हृदय सिन्धु का मन्थन करके यह नित्य विहार रूपी अद्भुत रत्न प्रकट किया है। आपने हाथ पकड़कर मेरी सारी भ्रान्तियों, अविद्याओं और भटकनों को दूर करके मेरे सब काम स्वयं बना दिये हैं। आप श्रीश्यामाश्याम की नित्य केलि में योगदान करने वाली सहचरियों में शिरोमणि स्वरूप हैं, इसीलिए सब रसिकों ने आपकी प्रशंसा की है।
बलि जैहौं श्रीरसिकचारज।
नित्य बिहार उद्धार कियौ जिन, मथि निज हृदय सिन्धु बारज॥
भ्रम, तम, स्रम सब हरे हमारे, कर गहि सकल संभारे कारज।
भगवत रसिक प्रसंसित कीने, स्यामा स्याम सहायक आरज॥
- श्री भगवत रसिक जी, भगवत रसिक की वाणी, अनन्यनिश्चयात्म ग्रन्थ - पूर्वार्द्ध (32)
भावार्थ - भगवतरसिकजी कहते हैं - रसिकाचार्य स्वामी श्री हरिदासजी! मैं आपकी बलिहारी जाता हूँ जिन्होंने अपने हृदय सिन्धु का मन्थन करके यह नित्य विहार रूपी अद्भुत रत्न प्रकट किया है। आपने हाथ पकड़कर मेरी सारी भ्रान्तियों, अविद्याओं और भटकनों को दूर करके मेरे सब काम स्वयं बना दिये हैं। आप श्रीश्यामाश्याम की नित्य केलि में योगदान करने वाली सहचरियों में शिरोमणि स्वरूप हैं, इसीलिए सब रसिकों ने आपकी प्रशंसा की है।

