यत्राभङ्गस्मरविलसितैः क्रीडतो दम्पती - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृंदावन महिमामृत (1.53)

यत्राभङ्गस्मरविलसितैः क्रीडतो दम्पती - श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृंदावन महिमामृत (1.53)

यत्राभङ्गस्मरविलसितैः क्रीडतो दम्पती तौ गौरश्यामौ प्रतिपदमहाश्चर्यसौन्दर्यराशी।
सान्द्रानन्दोन्मदरसमहासिन्धुसंमज्जिताली वृन्दौ वृन्दावनमिह महादुर्भगा नाश्रयन्ते॥

- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृंदावन महिमामृत (1.53)

जहां निरंतर कामविलास में क्रीड़ा परायण होकर प्रतिक्षण महाश्चर्यमय लाव्यण्य सौन्दर्य राशि का विस्तार करते हुए वही गौरश्यामाङ्ग युगलकिशोर गाढ़ आनन्द पूर्वक उन्मत्तकारी रस के महासमुद्र में सखीवृन्द को निमज्जित कर विहार कर रहे हैं, उस इसी श्रीवृन्दावन का महादुर्भाग्यवान मनुष्य ही आश्रय ग्रहण नहीं करते।