साँवरे की जिन निरखी मुसिक्यान - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (7)

साँवरे की जिन निरखी मुसिक्यान - श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (7)

(राग देश)
साँवरे की जिन निरखी मुसिक्यान।
सो तौ भई घायल ताही छिन, बिन बरछी बिन बान॥
कल नहिं लेति धरति नहिं धीरज, तलफति मीन समान।
नारायण भूली सुधि तन की, बिसर गयो सब ज्ञान॥

- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, युगल छदम लीला (7)

जिन्होंने सांवरिया की मुस्कान की झलक देख ली, वह तो बिना बरछी एवं बाण के ही उसी क्षण घायल हो गए। उनके लिए मानो एक क्षण के लिए भी धीरज धारण करना वैसे ही कठिन है जैसे मीन का जल बिना धीरज धारण करना है (मीन तो तड़पती रहती है) । उस मुस्कान को निहार के तन की सुधि भूल जाती है एवं सब ज्ञान बिसर जाता है।