हम हमरी है लाडली, कहें सुनें चितलाई।
कुंज केली निरखे सदा, महा परम सुख पाइ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (275)
हमारी प्राण श्रीलाड़िली राधा ही हैं, इसीलिए हम चित् लगाकर सदाकाल उनके ही केवल गुण गाते हैं एवं श्रवण करते हैं। उन्हीं की निकुंज-केलि नित्य-विहार का सदा अवलोकन करके महान आनंद का रसास्वादन करते हैं।
कुंज केली निरखे सदा, महा परम सुख पाइ॥
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (275)
हमारी प्राण श्रीलाड़िली राधा ही हैं, इसीलिए हम चित् लगाकर सदाकाल उनके ही केवल गुण गाते हैं एवं श्रवण करते हैं। उन्हीं की निकुंज-केलि नित्य-विहार का सदा अवलोकन करके महान आनंद का रसास्वादन करते हैं।

