राधेजू मेरौ जनम सुधारौ।
अब मोंहि वृन्दावन में डारौ॥ [1]
महा-अपावन खान औगुन की,
ऐसी जान न बिसारौ। [2]
निरबल दीन जान अपनावौ,
ये ही बिरद संभारौ॥ [3]
जनम - जनम घर जाई चेरी,
अब कहा देत हो टारौ। [4]
'गोविंदसरन' मोस्युँ कृपा कीज्यौ,
गहौ क्यों न हाथ हमारौ॥ [5]
- श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (69)
अब मोंहि वृन्दावन में डारौ॥ [1]
महा-अपावन खान औगुन की,
ऐसी जान न बिसारौ। [2]
निरबल दीन जान अपनावौ,
ये ही बिरद संभारौ॥ [3]
जनम - जनम घर जाई चेरी,
अब कहा देत हो टारौ। [4]
'गोविंदसरन' मोस्युँ कृपा कीज्यौ,
गहौ क्यों न हाथ हमारौ॥ [5]
- श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (69)
हे श्री राधाजू, मुझे वृंदावन वास प्रदान कर मेरे जीवन को सफल बना दीजिए। [1]
मैं महापतित और समस्त अवगुणों की खान हूँ, परंतु यह जानकर आप मेरा त्याग न कीजिए। [2]
मेरे समान निर्बल और दीन कौन होगा, मुझे असहाय जानकर अपना लीजिए। आपके सिवा संसार में मेरा कोई नहीं है, मेरी यह प्रार्थना स्वीकार कर लीजिए। [3]
अनन्त जन्मों से संसार के बंधन में भटक रहा हूँ, हे स्वामिनीजू, अब आप क्यों देरी कर रही हैं? [4]
श्री गोविंद शरण जी कह रहे हैं, "हे श्री राधाजू, मेरा हाथ पकड़ कर संसार से उबार कर मुझे अपनी शरण क्यों नहीं दे रही हो?" [5]

