बहुत मिले तो संग नहीं - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, मन शिक्षा लीला (37)

बहुत मिले तो संग नहीं - श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, मन शिक्षा लीला (37)

बहुत मिले तो संग नहीं, न्यारी न्यारी भाँति।
जुगल प्रेम रस मगन जे, तेई अपनी पाँति॥

- श्री ध्रुवदास, ब्यालीस लीला, मन शिक्षा लीला (37)

संसार में अपनी उपासना से भिन्न प्रकार के उपासक अधिक मिलते हैं, किन्तु उनका संग करना उचित नहीं है। वास्तव में अपनी जाति के वे ही सच्चे उपासक हैं, जो युगल श्री श्यामा-श्याम के प्रेम-रस में निमग्न अनन्य रसिक हैं।