श्री राधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्यसद्वैभवे - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (269)

श्री राधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्यसद्वैभवे - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (269)

श्री राधे श्रुतिभिर्बुधैर्भगवताप्यामृग्यसद्वैभवे स्वस्तोत्रं स्वकृपात एव सहजो योग्योप्यहं कारितः।
पद्येनैव सदापराधिनि महन्मार्गं विरुध्य त्वदेकाशे स्नेहजलाकुलाक्षि किमपि प्रीतिं प्रसादीकुरु॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (269)

वेद, पण्डितगण तथा भगवान के द्वारा भी अन्वेषणीय (ढूँढ़े जाने योग्य) श्रेष्ठ वैभव वाली हे श्री राधे ! आपने अपनी कृपा के ही द्वारा पद्य रूप में अपने स्तोत्र (स्तुति ग्रंथ) की रचना में मुझे सहज (बिना प्रयास के) योग्य बना दिया। हे स्नेह जल से भीगे नेत्र वाली, महापुरुषों द्वारा प्रतिपादित मार्गों का विरोध करने वाले, सदा अपराध युक्त और एकमात्र आपकी आशा रखने वाले मुझे अपने अनिर्वचनीय प्रीति का प्रसाद दीजिए।