(राग आसावरी)
हरि के नाम कों आलस कत करत है रे काल फिरत सर सांधे। [1]
बेर कुबेर कछू नहिं जानत चढ्यौ फिरत है कांधे॥ [2]
हीरा बहुत जवाहर संचे कहा भयौ हस्ती दर बाँधे। [3]
कहें श्री हरिदास महल में बनिता बनि ठाढ़ी भई॥ [4]
एकौ न चलत जब आवत अन्त की आँधें॥ [5]
- श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (10)
अरे अज्ञानी जीव! तू श्रीहरि-नाम रूपी धन का संग्रह करने में प्रमाद (आलस) क्यों करता है? देख, साक्षात् काल तुझे अपना ग्रास बनाने हेतु धनुष पर बाण संधान किए निरंतर तेरे पीछे लगा है। [1]
हरि के नाम कों आलस कत करत है रे काल फिरत सर सांधे। [1]
बेर कुबेर कछू नहिं जानत चढ्यौ फिरत है कांधे॥ [2]
हीरा बहुत जवाहर संचे कहा भयौ हस्ती दर बाँधे। [3]
कहें श्री हरिदास महल में बनिता बनि ठाढ़ी भई॥ [4]
एकौ न चलत जब आवत अन्त की आँधें॥ [5]
- श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (10)
अरे अज्ञानी जीव! तू श्रीहरि-नाम रूपी धन का संग्रह करने में प्रमाद (आलस) क्यों करता है? देख, साक्षात् काल तुझे अपना ग्रास बनाने हेतु धनुष पर बाण संधान किए निरंतर तेरे पीछे लगा है। [1]
वह निर्दयी काल न तो शुभ वेला की प्रतीक्षा करता है और न ही अशुभ समय का विचार करता है; वह तो क्षण-प्रतिक्षण तेरे कंधे पर सवार होकर तेरी आयु को क्षीण कर रहा है। [2]
एक जौहरी जीवनभर बहुमूल्य रत्नों का संग्रह करता है, किंतु विचार तो कर कि क्या वे हीरे-माणिक्य मृत्यु के उपरांत परलोक में उसकी सहायता कर सकेंगे? तेरे द्वार पर हाथी-घोड़ों की अटूट संपदा बँधी हो, तो भी क्या वे तुझे काल के पाश से मुक्त करा पाएँगे? अंततः जब मृत्यु के पश्चात काष्ठ की अर्थी पर तेरे दोनों हाथ निष्प्राण होकर बाँध दिए जाएँगे, तब उस संचित वैभव का क्या मूल्य रह जाएगा? [3]
तेरी अत्यंत रूपवती पत्नी भले ही पूर्ण शृंगार कर, स्वर्ण की आरती सजाए राजमहल के द्वार पर तेरी प्रतीक्षा में खड़ी हो, तो भी उससे क्या लाभ है? [4]
जब जीवन के अंतिम क्षणों की भयावह आँधी चलती है, तब न तो यह धन-वैभव काम आता है और न ही कोई स्वजन साथ देता है; केवल वह हरि-नाम ही काम आता है। [5]

