(दोहा)
तुम बिन स्वामिनि सुखनिधे, को समुझे यह मर्म।
मोहिं देहु पद परम प्रिय, है जु तुमहिं सब सर्म॥
(पद)
प्रिया मोहिं दीजै हो पद पर्म।
प्रनतन पाल कृपाल कृसोदरि है तिहरो यह धर्म॥
तुम बिन अहो सुकुंवारि सिरोमनि को समुझै निज मर्म।
श्रीहरिप्रिया स्वामिनी सुखनिधि है जु तुमहिं सब सर्म॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (98)
(दोहा)
श्रीलालजी अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीस्वामिनीजू के चरणारविन्दों को थामकर कहते हैं, "हे सुख की निधि श्रीस्वामिनीजू! आपके अतिरिक्त इस मर्म को कौन समझ सकता है? जो आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा करना आपका ही स्वभाव है। मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि आपके इन श्रीचरणों की कृपा मुझ पर सदैव बनी रहे।"
(पद)
हे प्रियाजू ! आप मुझको इन चरणारविंदों की सेवा प्रदान करें। हे कृशोदरी ! जो आपके आश्रित हैं, उनकी रक्षा करना आपका धर्म है। हे सुकुमारशिरोमणि ! आपके बिना मेरे निज मर्म की बात कौन समझ सकता है? आप ही मेरे सुख की निधान हैं। श्रीहरि प्रिया सखी ने आर्तजनों के दुख दूर करने की दीक्षा ले रखी है। आप उनकी स्वामिनी हो, इसलिए मेरी आर्ती दूर नहीं होने से आपको ही शर्म लगेगी।
तुम बिन स्वामिनि सुखनिधे, को समुझे यह मर्म।
मोहिं देहु पद परम प्रिय, है जु तुमहिं सब सर्म॥
(पद)
प्रिया मोहिं दीजै हो पद पर्म।
प्रनतन पाल कृपाल कृसोदरि है तिहरो यह धर्म॥
तुम बिन अहो सुकुंवारि सिरोमनि को समुझै निज मर्म।
श्रीहरिप्रिया स्वामिनी सुखनिधि है जु तुमहिं सब सर्म॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावानी, सुरत सुख (98)
(दोहा)
श्रीलालजी अत्यंत प्रसन्न होकर श्रीस्वामिनीजू के चरणारविन्दों को थामकर कहते हैं, "हे सुख की निधि श्रीस्वामिनीजू! आपके अतिरिक्त इस मर्म को कौन समझ सकता है? जो आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा करना आपका ही स्वभाव है। मेरी एकमात्र यही अभिलाषा है कि आपके इन श्रीचरणों की कृपा मुझ पर सदैव बनी रहे।"
(पद)
हे प्रियाजू ! आप मुझको इन चरणारविंदों की सेवा प्रदान करें। हे कृशोदरी ! जो आपके आश्रित हैं, उनकी रक्षा करना आपका धर्म है। हे सुकुमारशिरोमणि ! आपके बिना मेरे निज मर्म की बात कौन समझ सकता है? आप ही मेरे सुख की निधान हैं। श्रीहरि प्रिया सखी ने आर्तजनों के दुख दूर करने की दीक्षा ले रखी है। आप उनकी स्वामिनी हो, इसलिए मेरी आर्ती दूर नहीं होने से आपको ही शर्म लगेगी।

