जिनके पद-रज-परस ते - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (5.2)

जिनके पद-रज-परस ते - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (5.2)

जिनके पद-रज-परस ते, श्याम होंय बे भान।
बन्दौ तिन पद रज कननि, मधुर रसनि के खान॥

- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (5.2)

जिनके चरणों की रज के स्पर्श मात्र से स्वयं नन्दनन्दन श्रीश्यामसुन्दर भी अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं और प्रेम-विह्वल हो जाते हैं, मैं उन श्रीप्रिया जी के चरण-रज के कणों की वंदना करता हूँ। वे रज-कण साक्षात् मधुर रसों की दिव्य खान हैं।