हमारी राधे, निराधार आधार।
पतितन ही को देति प्रेमधन, पतितन की रिझवार॥
दीन जनन ही प्यार करति नित, दीनबंधु सरकार।
सहि न सकति क्रंदन पुनि अधमनि, अधम-उधारनि हार॥
आये शरण प्राण सम राखत, शरणागत रखवार।
हम ‘कृपालु’ सरकार भरोसे, सोवत पाँव पसार॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेमरस मदिरा, श्री राधा माधुरी (54)
भावार्थ- हमारी किशोरी जी निरवलम्ब की अवलम्ब हैं | उनकी पतितपावनता की बान इसी से स्पष्ट है कि वे अपने को पतित मानने वाले को ही, दिव्य प्रेमदान प्रदान करती हैं | उनकी दीनबन्धुता इसी से सिद्ध है कि वे अपने को दीन मानने वाले से ही, प्यार करती हैं |उनकी अधमोद्धारिणी बान का यही परिचय है कि वे अपने को अधम मानने वाले की, करुण-पुकार को सुन तक नहीं सकतीं, अर्थात् विह्वल हो जाती हैं | उनके शरणागत-रक्षण के स्वभाव का ज्वलन्त प्रमाण यह है कि वे शरणागत की अपने प्राण के समान रक्षा करती हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हम तो उन्हीं के शरणापन्न होकर शुभाशुभ कर्म से अवकाश पाकर सदा निश्चिन्त रहते हैं ।
पतितन ही को देति प्रेमधन, पतितन की रिझवार॥
दीन जनन ही प्यार करति नित, दीनबंधु सरकार।
सहि न सकति क्रंदन पुनि अधमनि, अधम-उधारनि हार॥
आये शरण प्राण सम राखत, शरणागत रखवार।
हम ‘कृपालु’ सरकार भरोसे, सोवत पाँव पसार॥
- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेमरस मदिरा, श्री राधा माधुरी (54)
भावार्थ- हमारी किशोरी जी निरवलम्ब की अवलम्ब हैं | उनकी पतितपावनता की बान इसी से स्पष्ट है कि वे अपने को पतित मानने वाले को ही, दिव्य प्रेमदान प्रदान करती हैं | उनकी दीनबन्धुता इसी से सिद्ध है कि वे अपने को दीन मानने वाले से ही, प्यार करती हैं |उनकी अधमोद्धारिणी बान का यही परिचय है कि वे अपने को अधम मानने वाले की, करुण-पुकार को सुन तक नहीं सकतीं, अर्थात् विह्वल हो जाती हैं | उनके शरणागत-रक्षण के स्वभाव का ज्वलन्त प्रमाण यह है कि वे शरणागत की अपने प्राण के समान रक्षा करती हैं | ‘श्री कृपालु जी’ कहते हैं कि हम तो उन्हीं के शरणापन्न होकर शुभाशुभ कर्म से अवकाश पाकर सदा निश्चिन्त रहते हैं ।

