ढूँढ़ि फिरै त्रेलोक जौ - ब्रज के दोहे

ढूँढ़ि फिरै त्रेलोक जौ - ब्रज के दोहे

ढूँढ़ि फिरै त्रेलोक जौ, मिलत कहूँ हरि नाहिं।
प्रेम रूप दोऊँ एकरस, बसत निकुँजन माहि॥

- ब्रज के दोहे

यदि कोई तीनों लोकों में भी ढूँढने फिरे, तो भी श्री हरि कहीं प्राप्त नहीं होते। वे तो केवल साक्षात् प्रेम के स्वरूप होकर, नित्य एकरस भाव से श्री वृन्दावन के कुंजों के भीतर निवास करते हैं जहाँ वे महाप्रेम-स्वरूप श्री किशोरीजू के साथ प्रेमवश विहार कर रहे हैं।