(राग कान्हरौ)
काहे कौं मान बढ़ावतु है, बालक मृग - लोचनि ।
हौंब डरनि कछु कहि न सकति, इक बात सँकोचनि ॥ [1]
मत्त मुरली अन्तर तव गावत, जागृत सैंन तवाकृति सोचनि ।
(जैश्री) हित हरिवंश महा मोहन पिय आतुर, विट विरहज दुख मोचनि ॥[2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (74)
मानवती श्रीराधा के मान मोचन के लिये उनको विदग्धता पूर्वक समझाती हुई श्री हित सजनी कहती हैं “हे मृगछौना जैसे भोले एवं रसीले नेत्र वाली (श्रीप्रिया) मान का विस्तार क्यों कर रही हो ?”
मैं इस समय भय से और संकोच से एक भी बात कहने में अपने को असमर्थ पा रही हूँ। [1]
मैं तो केवल इतना जानती हूँ कि श्रीश्यामघन मत्त-भाव से मुरली में तुम्हारा गान करते रहते हैं और सोते-जागते तुम्हारी आकृति का चिंतन करते रहते हैं।
सखी भावापन्न श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि मन मोहन एवं रस-लम्पट आतुर प्रियतम के विरह जनित दुख को दूर करने वाली श्रीप्रिया, उनके कष्ट को दूर करो।
(इस पद में सहचरी ने अपनी बात कहने में जिस भय एवं संकोच का उल्लेख किया है उसका निर्वाह उसने अंत तक किया है वह श्रीश्यामघनकी विरह-वेदना का तो पूरा चित्रण कर देती है किन्तु,अन्य पदों की भाँति, वह श्रीप्रिया से उनसे मिलने का आग्रह नहीं करती।) [2]
काहे कौं मान बढ़ावतु है, बालक मृग - लोचनि ।
हौंब डरनि कछु कहि न सकति, इक बात सँकोचनि ॥ [1]
मत्त मुरली अन्तर तव गावत, जागृत सैंन तवाकृति सोचनि ।
(जैश्री) हित हरिवंश महा मोहन पिय आतुर, विट विरहज दुख मोचनि ॥[2]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (74)
मानवती श्रीराधा के मान मोचन के लिये उनको विदग्धता पूर्वक समझाती हुई श्री हित सजनी कहती हैं “हे मृगछौना जैसे भोले एवं रसीले नेत्र वाली (श्रीप्रिया) मान का विस्तार क्यों कर रही हो ?”
मैं इस समय भय से और संकोच से एक भी बात कहने में अपने को असमर्थ पा रही हूँ। [1]
मैं तो केवल इतना जानती हूँ कि श्रीश्यामघन मत्त-भाव से मुरली में तुम्हारा गान करते रहते हैं और सोते-जागते तुम्हारी आकृति का चिंतन करते रहते हैं।
सखी भावापन्न श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि मन मोहन एवं रस-लम्पट आतुर प्रियतम के विरह जनित दुख को दूर करने वाली श्रीप्रिया, उनके कष्ट को दूर करो।
(इस पद में सहचरी ने अपनी बात कहने में जिस भय एवं संकोच का उल्लेख किया है उसका निर्वाह उसने अंत तक किया है वह श्रीश्यामघनकी विरह-वेदना का तो पूरा चित्रण कर देती है किन्तु,अन्य पदों की भाँति, वह श्रीप्रिया से उनसे मिलने का आग्रह नहीं करती।) [2]

