हँसनि में फुलनि की चाहनि में अमृत की - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (15)

हँसनि में फुलनि की चाहनि में अमृत की - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (15)

हँसनि में फुलनि की चाहनि में अमृत की,
नख-सिख रूप ही की बरषा सी होती है। [1]
केसनि की चंद्रिका सुहाग अनुराग घटा,
दामिनी की लसनी दसन ही की दोती है॥ [2]
'हित ध्रुव' पानिप तरंग-रस छलकत,
ताकि मानौ सहज सिंगार सीवाँ पोति है। [3]
अति अलबेली प्रिये भूषित भूषन बिनु,
छिन-छिन औरै और बदन की जोति है॥ [4]

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 1 (15)

श्री प्रिया जी का हास्य कुसुम निर्झर के समान है, और उनका अवलोकन सरस सुधा-प्रवाह के समान है। उनके सर्वांग स्वरूप से रूप-सौंदर्य की वर्षा होती रहती है। [1]

उनकी केश-राशि का विस्तार सुहाग और अनुराग में उमड़ते मेघ के समान है, और उनकी दसन-द्युति दामिनी की दमक के समान कान्तियुक्त है। [2]

श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि प्रिया के रूप में अद्भुत लावण्यपूर्वक रस की तरंगें छलकती रहती हैं, और कंठ में धारण की हुई पोत की लड़ी श्रृंगार की परमावधि है। [3]

अनन्य लावण्य-सौंदर्यमयी प्रिया, भूषण-रहित होते हुए भी भूषणों से अलंकृत होने से अधिक शोभामयी प्रतीत होती हैं, और उनके मुख-मंडल की ज्योति प्रतिक्षण नित्य नवनवायमान होती रहती है। [4]