श्रद्धाभक्त्योरभावेपि भगवन्नामसंकीर्तन - जगद्गुरू शंकराचार्य, शांकरभाष्य (14)

श्रद्धाभक्त्योरभावेपि भगवन्नामसंकीर्तन - जगद्गुरू शंकराचार्य, शांकरभाष्य (14)

श्रद्धाभक्त्योरभावेपि भगवन्नामसंकीर्तन समस्त दुरितं नाशयतीत्युक्तम् किमतु-श्रद्धापूर्वकम्।
- जगद्गुरू शंकराचार्य, शांकरभाष्य (14)

मन में श्रद्धा भक्ति न भी हो तो भी भगवान के नाम का संकीर्तन सब पापों का नाश कर देता है, फिर यदि श्रद्धा हो तब तो बात ही क्या है।