जब तै श्रवन सुन्यौ तेरौ नाम।
तब तै हा राधा राधा हरि, इहै जु मंत्र जपत दुरि दाम॥ [1]
रहत निकुंज निसि कालिंद्री तट, सुहृद सखा छाडे सुख धाम।
बिरह बियोग महा जोगी लौं, जागत ही बीतत जुग जाम॥ [2]
कबहुंक किसल पीठ रचि पचि कै, कबहुंक पाठ करत गुन ग्राम।
कबहुंक लोचन मूदि मौन ह्वै, चित चिंतत ये अंग अभिराम॥ [3]
तरपन नैन हृदै होमत हवि, बिप्र भोज बोलत बिश्राम।
सूर स्याम कृस गात सकल अंग, दरसन दै पिय पुजवहु काम॥ [4]
- श्री सूरदास जी
हे श्री राधा! जब से श्री कृष्ण ने आपका नाम सुना है तब से "हा राधा, हा राधा" बस यही मंत्र नित्य जप रहे हैं। [1]
अपने प्रिय सखाओं को छोड़कर श्री कृष्ण रात्रि में यमुना तट पर निकुंज में रहते हैं और आपके वियोग के विरह में महान योगी की भांति संपूर्ण रात्रि जागते हुए व्यतीत करते हैै एवं हर प्रहर युगों के समान अनुभव करते हैं। [2]
कभी-कभी वह स्वयं पत्तों की शय्या का निर्माण करते हैं, कभी-कभी आपके गुणों का गान करते हैं, कभी-कभी वह हर प्रकार से मौन होकर अपनी आँखें बंद कर लेतें हैं और आपके अंग-प्रत्यंगों का ध्यान करते हैं! [3]
श्री कृष्ण की आँखें आपको देखने के लिए तड़प रही हैं, उनका हृदय आपके वियोग में यज्ञ की प्रतिक्षण वर्धमान अग्नि की भांति जल रही है। श्री कृष्ण का सम्पूर्ण शरीर भोजन न करने के कारण अब दुर्बल हो गया है। श्री सुरदास जी कहते हैं, "हे श्री राधे! श्री कृष्ण को शीघ्र अपना दर्शन दीजिये एवं उनकी इच्छा पूर्ण कीजिये।" [4]
तब तै हा राधा राधा हरि, इहै जु मंत्र जपत दुरि दाम॥ [1]
रहत निकुंज निसि कालिंद्री तट, सुहृद सखा छाडे सुख धाम।
बिरह बियोग महा जोगी लौं, जागत ही बीतत जुग जाम॥ [2]
कबहुंक किसल पीठ रचि पचि कै, कबहुंक पाठ करत गुन ग्राम।
कबहुंक लोचन मूदि मौन ह्वै, चित चिंतत ये अंग अभिराम॥ [3]
तरपन नैन हृदै होमत हवि, बिप्र भोज बोलत बिश्राम।
सूर स्याम कृस गात सकल अंग, दरसन दै पिय पुजवहु काम॥ [4]
- श्री सूरदास जी
हे श्री राधा! जब से श्री कृष्ण ने आपका नाम सुना है तब से "हा राधा, हा राधा" बस यही मंत्र नित्य जप रहे हैं। [1]
अपने प्रिय सखाओं को छोड़कर श्री कृष्ण रात्रि में यमुना तट पर निकुंज में रहते हैं और आपके वियोग के विरह में महान योगी की भांति संपूर्ण रात्रि जागते हुए व्यतीत करते हैै एवं हर प्रहर युगों के समान अनुभव करते हैं। [2]
कभी-कभी वह स्वयं पत्तों की शय्या का निर्माण करते हैं, कभी-कभी आपके गुणों का गान करते हैं, कभी-कभी वह हर प्रकार से मौन होकर अपनी आँखें बंद कर लेतें हैं और आपके अंग-प्रत्यंगों का ध्यान करते हैं! [3]
श्री कृष्ण की आँखें आपको देखने के लिए तड़प रही हैं, उनका हृदय आपके वियोग में यज्ञ की प्रतिक्षण वर्धमान अग्नि की भांति जल रही है। श्री कृष्ण का सम्पूर्ण शरीर भोजन न करने के कारण अब दुर्बल हो गया है। श्री सुरदास जी कहते हैं, "हे श्री राधे! श्री कृष्ण को शीघ्र अपना दर्शन दीजिये एवं उनकी इच्छा पूर्ण कीजिये।" [4]

