(राग कल्याण)
हरि कौ ऐसोई सब खेल।
मृग तृष्णा जग ब्यापि रह्यों है कहूँ बिजौरौ न बेल॥ [1]
धन-मद जोवन-मद राज-मद ज्यौं पंछिन में डेल।
कहें श्री हरिदास यहै जिय जानौ तीरथ कैसौ मेल॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (13)
इस मायिक जगत में श्रीहरि की लीला अत्यंत विलक्षण है, जहाँ वास्तविक सुख का न तो कोई बीज है और न ही कोई लता। जीव नश्वर पदार्थों से सुख पाने की आशा में वैसे ही भटक रहे हैं, जैसे कोई मृग मरुस्थल में सूर्य की किरणों को जल (मृगतृष्णा) समझकर उनकी ओर दौड़ता चला जाता है, जहाँ वास्तव में जल की एक बूँद भी उपलब्ध नहीं है। [1]
संसार का यह समस्त समागम क्षणभंगुर है, फिर भी जीव मिथ्या अहंकार के वशीभूत होकर धन, यौवन और सत्ता के मद में निमग्न रहता है; किंतु ये समस्त मद सर्वथा व्यर्थ हैं। यह एक दिन उसी प्रकार विलीन हो जाएगा, जैसे किसी वृक्ष की डाल पर क्षण-भर को बैठे पक्षी सहसा उड़ जाते हैं। रसिक-नृपति स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज बोध कराते हैं कि इन मायिक सुखों और संबंधियों को तीर्थ पर एकत्र हुए यात्रियों की भाँति समझो, जो दो-चार दिनों के प्रवास के पश्चात अपने-अपने गंतव्य को प्रस्थान कर जाते हैं। अतः इस नश्वर जगत में श्रीहरि के अतिरिक्त तुम्हारा अपना और कोई नहीं है। [2]
हरि कौ ऐसोई सब खेल।
मृग तृष्णा जग ब्यापि रह्यों है कहूँ बिजौरौ न बेल॥ [1]
धन-मद जोवन-मद राज-मद ज्यौं पंछिन में डेल।
कहें श्री हरिदास यहै जिय जानौ तीरथ कैसौ मेल॥ [2]
- श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (13)
इस मायिक जगत में श्रीहरि की लीला अत्यंत विलक्षण है, जहाँ वास्तविक सुख का न तो कोई बीज है और न ही कोई लता। जीव नश्वर पदार्थों से सुख पाने की आशा में वैसे ही भटक रहे हैं, जैसे कोई मृग मरुस्थल में सूर्य की किरणों को जल (मृगतृष्णा) समझकर उनकी ओर दौड़ता चला जाता है, जहाँ वास्तव में जल की एक बूँद भी उपलब्ध नहीं है। [1]
संसार का यह समस्त समागम क्षणभंगुर है, फिर भी जीव मिथ्या अहंकार के वशीभूत होकर धन, यौवन और सत्ता के मद में निमग्न रहता है; किंतु ये समस्त मद सर्वथा व्यर्थ हैं। यह एक दिन उसी प्रकार विलीन हो जाएगा, जैसे किसी वृक्ष की डाल पर क्षण-भर को बैठे पक्षी सहसा उड़ जाते हैं। रसिक-नृपति स्वामी श्रीहरिदासजी महाराज बोध कराते हैं कि इन मायिक सुखों और संबंधियों को तीर्थ पर एकत्र हुए यात्रियों की भाँति समझो, जो दो-चार दिनों के प्रवास के पश्चात अपने-अपने गंतव्य को प्रस्थान कर जाते हैं। अतः इस नश्वर जगत में श्रीहरि के अतिरिक्त तुम्हारा अपना और कोई नहीं है। [2]

