भो भो धन्य शिरोमर्णे! भगवतः पादाम्बुजैकांतिक प्रेम्णश्चेत् परमं रहस्यमतिदुष्प्राप्यं च संप्रेप्स्यसि।
तत्त्वं नित्यविहारमन्दिररमिदं श्रीराधिकाकृष्णयो-राद्य-स्वाद्यरसात्मकाखिलसमृद्ध्याऽघ्यास्स्व वृन्दावनम्।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृंदावन महिमामृत (6.5)
हे धन्य शिरोमणि! यदि भगवत् चरण-कमलों के एकांतिक प्रेम के अति दुर्लभ परम रहस्य को सम्यक रूप से प्राप्त करने की तुझे इच्छा है, तो तू आद्य आस्वाद्य-रसात्मक अखिल भावों से पूर्ण श्रीराधा-कृष्ण के नित्य-विहार मन्दिर इस श्रीवृन्दावन में वास कर।
तत्त्वं नित्यविहारमन्दिररमिदं श्रीराधिकाकृष्णयो-राद्य-स्वाद्यरसात्मकाखिलसमृद्ध्याऽघ्यास्स्व वृन्दावनम्।।
- श्री प्रबोधानंद सरस्वती, वृंदावन महिमामृत (6.5)
हे धन्य शिरोमणि! यदि भगवत् चरण-कमलों के एकांतिक प्रेम के अति दुर्लभ परम रहस्य को सम्यक रूप से प्राप्त करने की तुझे इच्छा है, तो तू आद्य आस्वाद्य-रसात्मक अखिल भावों से पूर्ण श्रीराधा-कृष्ण के नित्य-विहार मन्दिर इस श्रीवृन्दावन में वास कर।

