सुनहु रसिक श्रीवृन्दावन को जस - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विठ्ठल विपुल देव जू की वाणी (13)

सुनहु रसिक श्रीवृन्दावन को जस - श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विठ्ठल विपुल देव जू की वाणी (13)

(राग बिलावल)
सुनहु रसिक श्रीवृन्दावन को जस। [1]
कुञ्ज केलि मानिनी मनोहर
परबस भये नाँहिने अपने बस॥ [2]
इहि बन नित्य नवीन युगल वर
द्रुम दल दिव्य श्रवण सलिता लस। [3]
श्री विट्ठल विपुल विनोद बिहारी कौ
पानि कियौ चाहत रसना रस॥ [4]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विठ्ठल विपुल देव जू की वाणी (13)

हे रसिक भक्तों ! श्री वृन्दावन धाम की महिमा एवं यश सुनें जहां श्री वृंदावन की कुंज केलियों में श्री कृष्ण मानिनी श्री राधा के वशीभूत होकर अंतरंग क्रीड़ा कर रहे हैं। यहाँ उनके वश कुछ नहीं है सब कुछ एक मात्र श्री किशोरीजी के वश ही है एवं वह उनकी नित्य दासता करते हैं। [1 & 2]
इस वन में नित्य ही श्री युगल वर श्री राधा कृष्ण नवीन रहते हैं (अर्थात नित्य नवनमान रसयुक्त ) एवं यहाँ के वृक्ष, लताएं सब दिव्य हैं, यमुना रस रानी सब दिव्य हैं एवं हर क्षण रस में निमग्न हैं। [3]
श्री विट्ठल विपुल बिहारी जी कहते हैं कि वह इस केलि रस में नित्य ही निमग्न रहना चाहते हैं एवं अपनी रसना से इस रस का पान करना चाहते हैं। [4]