मोरपखा गर गुन्ज की माल - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (35)

मोरपखा गर गुन्ज की माल - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (35)

(सवैया)
मोरपखा गर गुन्ज की माल, किये नव भेष बड़ी छबि छाई। [1]
पीतपटी दुपटी कटी में, लपटी लकुटी हठी मो मन भाई॥ [2]
छुटी लटैं डुलै कुण्डल कान, बजै मुरली धुनि मन्द सुहाई। [3]
कोटिन काम गुलाम भये, जब कान्ह ह्वै भानलली बनि आई॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (35)

आज श्रीराधा ने सिर पर मोरपंख और गुँजमाला सजाकर एक अनुपम और मोहक रूप धारण किया। [1]

श्री हठी जी कहते हैं—कटि पर पीताम्बर, हाथ में लकुटी, इस अद्भुत छवि ने मेरा मन पूरी तरह चुरा लिया। [2]

उनके घुँघराले केश कपोलों पर बार-बार झूल जाते हैं, कानों में झूमते कुंडल चमकते हैं, और वे धीरे-धीरे बांसुरी पर बहुत मधुर धुन बजा रही हैं। [3]

जब वृषभानु दुलारी श्रीराधा स्वयं श्रीकृष्ण रूप धारण करती हैं, तब करोड़ों कामदेव भी लज्जित होकर उनकी दासी बनने की याचना करते हैं। [4]