रस रूप मयी रस की सरिता - ब्रज रसिक

रस रूप मयी रस की सरिता - ब्रज रसिक

(सवैया)
रस रूप मयी रस की सरिता, सुख रूप सदा सुख कंदनी के। [1]
वसुधा की सुधा वृज की सुषमा, वृषभानु सुता जग बंदनी के॥ [2]
जल मीनन मान विभंजनी के, मृग खंजन नैन निकंदनी के। [3]
जिनको जग बंदन देखो वही, पग बन्दत कीरति नन्दिनी के॥ [4]

- श्री हरे कृष्ण जी

श्रीराधा रस का मूर्त स्वरूप हैं, रस की सरिता हैं, और सदा सुख की मूल स्रोत हैं। [1]

वे पृथ्वी में अमृत बरसाने वाली ब्रज की शोभा हैं, वृषभानु की पुत्री और सम्पूर्ण जगत की वंदनीय हैं। [2]

उनकी चंचल दृष्टि मीन के गर्व को तोड़ देती है और उनकी नेत्र-भंगिमा मृग और खंजन की चपलता को मात कर देती है। [3]

जिनको समस्त संसार वंदन करता है, वे भगवान श्रीकृष्ण, श्रीराधा के चरणों में वंदन करते हैं। [4]