मोकौं सदा सरन यह वन है - श्री आनन्दघन जी

मोकौं सदा सरन यह वन है - श्री आनन्दघन जी

मोकौं सदा सरन यह वन है।
राधा - जीवन जीवन - धन है॥ [1]
बसौ निरन्तर आँखिन आगै।
पल - पल जोति अपूरब जागै॥ [2]
वन मेरौ हौं वृन्दावन कौ।
बन रखवारो है मन पन कौ॥ [3]
आनन्दघन वृन्दावन बसै।
महामधुर रस धारा रसै॥ [4]

- श्री आनन्दघन जी

मेरी एक मात्र शरण सदा से वृन्दावन धाम ही है। श्री राधा रानी ही मेरा जीवन प्राण एवं जीवन धन है एवं एक अपूर्व ज्योति की भाँती मेरी आंखों के आगे सदैव जगमगाती रहती है। [1 & 2]
श्री वृंदावन धाम ने मुझे अपनी कृपा से अपना लिया है और अब मैं श्री वृंदावन का अनन्य हो चुका हूँ और यही श्री वृंदावन धाम मेरे मन और प्राणों का रखवार है। [3]
श्री आनंदघन जी कहते हैं कि "अब तो मैं सदैव वृंदावन में रहता हूँ और महामाधुर्य रस की धारा का नित्य पान करता हूँ।" [4]