कबै झुकत मो ओर कौं, ऐहैं मद गज चाल।
गरबाँही दीने दोउ, प्रियानवल नन्द लाल॥
- श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (10)
ऐसा कब होगा जब श्री प्रिया-लाल वृन्दावन में यमुना-तट पर लता-पत्तों के मध्य विहार करते हुए, एक-दूसरे को गलबहियाँ दिए, एक-दूसरे की ओर झुके हुए, अलमस्त गजराज की चाल से मेरी ओर आएँगे?
गरबाँही दीने दोउ, प्रियानवल नन्द लाल॥
- श्री नागरीदास जी (महाराज सावंत सिंह जी), श्री नागरीदास जी की वाणी, मनोरथ मञ्जरी (10)
ऐसा कब होगा जब श्री प्रिया-लाल वृन्दावन में यमुना-तट पर लता-पत्तों के मध्य विहार करते हुए, एक-दूसरे को गलबहियाँ दिए, एक-दूसरे की ओर झुके हुए, अलमस्त गजराज की चाल से मेरी ओर आएँगे?

