दिव्यप्रमोदरससारनिजांगसंग - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (5)

दिव्यप्रमोदरससारनिजांगसंग - श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (5)

दिव्यप्रमोदरससारनिजांगसंग पीयूषविचिनिचयैरभिषेचयन्ति।
कन्दर्प कोटि शरमूर्च्छित नन्दसूनुर्संजीवनी जयति कापि निकुंजदेवी॥

- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री राधा सुधा निधि (5)

अलौकिक आनन्द स्वरूप रस के सारभूत अपने श्रीअंगों के संगरूपी अमृत तरंगों के समूह से सींचकर, कोटि-कोटि कामदेवों के बाणों से व्यथित नन्दकुमार को संजीवित करने वाली कोई अनिर्वचनीय निकुंजदेवी की जय हो।