नित ही प्रति देखि-देखि गुन गाऊँ - श्री भगवत रसिक जी, अनन्य रसिकाभरण ग्रन्थ (10.5)

नित ही प्रति देखि-देखि गुन गाऊँ - श्री भगवत रसिक जी, अनन्य रसिकाभरण ग्रन्थ (10.5)

नित ही प्रति देखि-देखि गुन गाऊँ।
अति उदार, सुकुमार, मनोहर, जुगल किशोर लड़ाऊँ॥ [1]
अंग-अंग रस रंग माधुरी, पीवन जीव जीवाऊँ।
भगवत रसिक रसीली बातें, कहत सुनत सुख पाऊँ॥ [2]

- श्री भगवत रसिक जी, अनन्य रसिकाभरण ग्रन्थ (10.5)

श्री भागवत रसिक जी कहते हैं कि नित्य ही वह प्रिया लाल का नित्य विहार देख देख गुणगान करते हैं। युगल सरकार श्री राधा कृष्ण जो अत्यंत उदार, सुकुमार एवं अत्यंत मनोहर हैं उनको दिन रात लाड़ लड़ाते हैं। [1]
रंगीले दोऊ दिव्य युगल के अंग अंग में मानो दिव्य रस माधुरी का पान करके ही वह नित्य जीते हैं एवं प्रिया लाल की रसीली बातें सुन कर एवं कह कर अत्यंत सुख अनुभव करते हैं। [2]