माधुरी की कुंज तामैं मोद की लै सेज रची - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (24)

माधुरी की कुंज तामैं मोद की लै सेज रची - श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (24)

माधुरी की कुंज तामैं मोद की लै सेज रची,
तेहि पर राजै अलबेले सुकुमार री। [1]
रूप तेज मोद के जुगल तन जगमगै,
हाव-भाव चातुरी के भूषन सुढार री॥ [2]
नेह-नीर नैननि की सैंननि में रहे भींजि,
कौन रंग बाढ्यौ जहाँ बोलिबौऊ भार री। [3]
अति ही आसक्त सखी रहीं मोहि जोहि-जोहि,
"हित ध्रुव" प्राननि कौ यहै है अहार री॥ [4]

- श्री ध्रुवदास जी, बयालीस लीला, श्रृंगार शत 2 (24)

समस्त ब्रह्मांड की मधुरता को लिए कुंज भवन है, जिसमें स्वयं आनंद ही शय्या की प्रकट रचना है, और उस पर विराजमान अलबेले श्री सुकुमारी-सुकुमार जी सुशोभित हैं। [1]

रूप का तेज और आनंद के स्वरूप श्री युगल के तन झिलमिला रहे हैं, और उनकी भाव-भंगिमा व चतुरता आभूषण के रूप में सुंदरता से ढले हुए हैं। [2]

प्रेम के जल में उनके नयन किस चिंतन में भीग रहे हैं, यह कौन सा रस-रंग अधिक बढ़ गया है, इस स्थान पर यह कहना भी अत्यंत कठिन प्रतीत हो रहा है। [3]

श्री हित ध्रुवदास जी महाराज कहते हैं कि सभी सखियाँ अत्यंत लिप्तता से मोहित होकर उनके श्रीमुख को देख-देख कर रस में भीग रही हैं, और सखियों के प्राणों का भोजन भी तो यही है। [4]