हमारी स्वामिनी राधे रानी॥ [1]
श्री वृषभानु किशोरी भोरी, सरल प्रेम-सुख-खानी।
श्री बरसानो नित्य-धाम अरु, वृन्दावन रजधानी॥ [2]
सखिन-जूथ सँग नित प्रति नव-रस, बरसावति मनमानी।
ताल, तमाल, रसाल बोल नित, 'राधे! राधे!' बानी॥ [3]
सिंहासन-आरूढ़ चलति जब, करत ब्रह्म अगवानी।
लखि 'कृपालु' बलि जात कहत 'जय, जयति-जयति महरानी'॥ [4]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेमरस मदिरा, दैन्य-माधुरी (99)
हमारी स्वामिनी वृषभानु नंदिनी श्री राधारानी हैं। [1]
जो अत्यंत भोली-भाली सरलहृदया एवं प्रेमसुख की खान हैं। उनका नित्य निवास-धाम श्री बरसाना है, एवं उनकी राजधानी वृंदावन है। [2]
करोड़ों सखियों के साथ सदा नित्य नूतन मनमाने ढंग से रास-रस बरसाती हैं। उनके धाम में स्थावर, ताल, तमाल आम्र आदि के वृ्क्ष भी निरन्तर'राधे' 'राधे'की रटना लगाये रहते हैं। [3]
जब हमारी स्वामिनी श्रीवृषभानुनन्दिनी सिंहासन पर बैठ कर चलती हैं, तब पूर्ण पुरुषोत्तम श्री कृष्ण उनका स्वागत करते हैं। 'श्री कृपालुजी'कहते हैं कि स्वागत करते हुए ब्रह्म को देखकर मैं बलि-बलि जाता हूँ, एवं बार-बार महारानी राधारानी की जय जयकार बोलता हूँ। [4]
श्री वृषभानु किशोरी भोरी, सरल प्रेम-सुख-खानी।
श्री बरसानो नित्य-धाम अरु, वृन्दावन रजधानी॥ [2]
सखिन-जूथ सँग नित प्रति नव-रस, बरसावति मनमानी।
ताल, तमाल, रसाल बोल नित, 'राधे! राधे!' बानी॥ [3]
सिंहासन-आरूढ़ चलति जब, करत ब्रह्म अगवानी।
लखि 'कृपालु' बलि जात कहत 'जय, जयति-जयति महरानी'॥ [4]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेमरस मदिरा, दैन्य-माधुरी (99)
हमारी स्वामिनी वृषभानु नंदिनी श्री राधारानी हैं। [1]
जो अत्यंत भोली-भाली सरलहृदया एवं प्रेमसुख की खान हैं। उनका नित्य निवास-धाम श्री बरसाना है, एवं उनकी राजधानी वृंदावन है। [2]
करोड़ों सखियों के साथ सदा नित्य नूतन मनमाने ढंग से रास-रस बरसाती हैं। उनके धाम में स्थावर, ताल, तमाल आम्र आदि के वृ्क्ष भी निरन्तर'राधे' 'राधे'की रटना लगाये रहते हैं। [3]
जब हमारी स्वामिनी श्रीवृषभानुनन्दिनी सिंहासन पर बैठ कर चलती हैं, तब पूर्ण पुरुषोत्तम श्री कृष्ण उनका स्वागत करते हैं। 'श्री कृपालुजी'कहते हैं कि स्वागत करते हुए ब्रह्म को देखकर मैं बलि-बलि जाता हूँ, एवं बार-बार महारानी राधारानी की जय जयकार बोलता हूँ। [4]

