प्रिया बिन सुद्ध प्रेम नहीं पावै - श्री ललित किशोरी, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (45)

प्रिया बिन सुद्ध प्रेम नहीं पावै - श्री ललित किशोरी, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (45)

प्रिया बिन सुद्ध प्रेम नहीं पावै। [1]
भुव मंडल बैकुंठलोक की लौं उँच नीच केतौ किन धावै॥ [2]
एतौ मिलैं मिल्योई चाहत छिन छिन प्रीतम रंग बढावै। [3]
श्रीकुंजबिहारिनि ललित लाडिली तन मन वचननि हियो सिरावै॥ [4]

- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (45)

इस पृथ्वी मंडल या बैकुंठ धाम या फिर कहीं किसी भी लोक चले जाओ परंतु यह निर्विवाद सत्य है कि सर्वोपरि श्री वृंदावन की अनन्य विलासिनी श्री नित्य बिहारिनि श्री राधा के बिना कहीं प्रेम का विशुद्ध पूर्णतम दाता नहीं है । [1 & 2]
क्योंकि जिन के प्रेम में वशीभूत होकर स्वयं श्री लालजी तन मन प्राणों से निरंतर मिले रहते हुए भी आकुल और व्याकुल होकर नित्य सतत श्री प्यारी जू के रंग को बढ़ाते हैं एवं उनकी सेवा करते हैं । [3]
ऐसे ही अद्भुत सुख से श्री कुंज बिहारिनि लाडली हमारे तन मन और प्राणों को सतत सिराति रहती हैं (हमको रस में डुबाती रहती हैं )। [4]