हीन हौं, अधीन हौं तिहारो ब्रज-साहिबनी! - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (50)

हीन हौं, अधीन हौं तिहारो ब्रज-साहिबनी! - श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (50)

(कवित्त)
हीन हौं, अधीन हौं तिहारो ब्रज-साहिबनी!
हिय में मलीन करुना की कोर ढरिए। [1]
भारी भवसागर में बोरत बचायौ मोहिं,
काम क्रोध लोभ मोह लागे सब अरिए॥ [2]
बुरो-भलो, जैसो-तैसो, तेरे द्वार पर्यौ हौं तौं,
मेरे गुन-औगुन तूं मन में न धरिए। [3]
कीरति-किसोरी, वृषभानु की दुहाई तोंहिं,
लच्छ-लच्छ भाँति सों 'हठी' को पच्छ करिए॥ [4]

- श्री हठी जी, राधा सुधा शतक (50)

हे वृंदावनेश्वरी! यद्यपि मैं अयोग्य और तुच्छ हूँ, फिर भी आपके चरणकमलों की शरण में आया हूँ। कृपया अपनी करुणामयी दृष्टि मुझ पर डालें, क्योंकि मेरा ह्रदय पापों और दोषों से भरा हुआ है। [1]

हे श्री राधे, मैं भवसागर में डूब रहा हूँ। कृपया मेरा हाथ पकड़कर मुझे बचा लीजिए, जिससे काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि मुझे शत्रु प्रतीत हों और मैं जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाऊँ। [2]

चाहे मैं अच्छा हूँ या बुरा, जैसा भी हूँ, परन्तु मैंने आपकी शरण ली है।  कृपया मेरे गुण-अवगुणों पर विचार न करें। अब मैं केवल आपका हूँ और किसी का नहीं! [3]

कवि श्री हठी जी ने कीर्ति दुलारी श्री राधा से प्रार्थना की है कि वे अपने पिता वृषभानु जी की शपथ लेकर सदा उनपर कृपा बनाए रखें। [4]