(राग कल्याण एवं कान्हरौ)
झूठी बात सांची करि दिखावत हौ हरि नागर। [1]
निसि दिन बुनत उधेरत जात प्रपंच कौ सागर॥ [2]
ठाट बनाय धरयौ मिहरी कौ है पुरुषतें आगर। [3]
सुनि हरिदास यहैं जिय जानों सपनें कौ सौ जागर॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (14)
प्रस्तुत पद में श्रीहरिदासजी जीव की अति प्रबल संसार-आसक्ति को देखकर श्रीबिहारीजी से कहते हैं कि आप ऐसे नागर नटवर-शिरोमणि हो जो कि इस मिथ्या (झूठे) मायिक जगत को ही सच्चा कर दिखा रहे हो। [1]
दिन-रात इस माया-रूपी प्रपंच के बुन को बुनते हो और उधेड़ते हो, और आपकी माया इतनी प्रबल है कि जीव आपको भूलकर इसी माया को सत्य मान बैठे हैं। [2]
हे परम पुरुषोत्तम! आपने इस भौतिक जगत का ऐसा मायावी ठाट-बाट रचा है कि जीव इसमें इस प्रकार लिप्त हो गया है कि वह आपके दिव्य और रसमय स्वरूप की ओर दृष्टिपात करने की इच्छा तक नहीं करता। [3]
अंत में श्रीहरिदासजी समस्त जीवों को झकझोरते हुए सावधान करते हैं, "अरे भाई! चेतो! जिस प्रकार निद्रा भंग होने पर स्वप्न का कोई अस्तित्व या मूल्य शेष नहीं रहता, ठीक वैसे ही यह संसार भी एक भ्रामक स्वप्न मात्र है। इस अनित्य जगत में केवल श्रीहरि का अनन्य भजन ही एकमात्र ध्रुव सत्य है।" [4]
झूठी बात सांची करि दिखावत हौ हरि नागर। [1]
निसि दिन बुनत उधेरत जात प्रपंच कौ सागर॥ [2]
ठाट बनाय धरयौ मिहरी कौ है पुरुषतें आगर। [3]
सुनि हरिदास यहैं जिय जानों सपनें कौ सौ जागर॥ [4]
- श्री स्वामी हरिदास, अष्टादश पद (14)
प्रस्तुत पद में श्रीहरिदासजी जीव की अति प्रबल संसार-आसक्ति को देखकर श्रीबिहारीजी से कहते हैं कि आप ऐसे नागर नटवर-शिरोमणि हो जो कि इस मिथ्या (झूठे) मायिक जगत को ही सच्चा कर दिखा रहे हो। [1]
दिन-रात इस माया-रूपी प्रपंच के बुन को बुनते हो और उधेड़ते हो, और आपकी माया इतनी प्रबल है कि जीव आपको भूलकर इसी माया को सत्य मान बैठे हैं। [2]
हे परम पुरुषोत्तम! आपने इस भौतिक जगत का ऐसा मायावी ठाट-बाट रचा है कि जीव इसमें इस प्रकार लिप्त हो गया है कि वह आपके दिव्य और रसमय स्वरूप की ओर दृष्टिपात करने की इच्छा तक नहीं करता। [3]
अंत में श्रीहरिदासजी समस्त जीवों को झकझोरते हुए सावधान करते हैं, "अरे भाई! चेतो! जिस प्रकार निद्रा भंग होने पर स्वप्न का कोई अस्तित्व या मूल्य शेष नहीं रहता, ठीक वैसे ही यह संसार भी एक भ्रामक स्वप्न मात्र है। इस अनित्य जगत में केवल श्रीहरि का अनन्य भजन ही एकमात्र ध्रुव सत्य है।" [4]

