'रस की बात मधुप नीरस सुन रसिक होय सो जानै' - श्री सूरदास जी

'रस की बात मधुप नीरस सुन रसिक होय सो जानै' - श्री सूरदास जी

रस की बात मधुप नीरस सुन रसिक होय सो जानै।
- श्री सूरदास जी

गोपियों द्वारा ज्ञानी उद्धव को उत्तर: रस की वार्ता नीरस हृदय को नहीं भाती, वह केवल रसिक हृदय से ही समझी एवं ग्रहण की जाती है।