(राग बिहाग)
करू मन, नंदनँदनको ध्यान। [1]
यहि अवसर तोहिं फिर न मिलैगौ, मेरौ कह्यौ अब मान॥ [2]
घूँघरवारी अलकैं मुखपै, कुंडल झलकत कान। [3]
नारायन अलसाने नैना, झूमत रूप निधान॥ [4]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, पद सिद्धान्त (9)
अरे मन, नन्दनन्दन श्री कृष्ण का स्मरण कर। [1]
हे मन, मुझे ध्यान से सुन, यह महान अवसर तुझको फिर से प्राप्त नहीं होगा। [2]
श्री कृष्ण के मुख पर उनके घुंघराले काले केश हैं और कानों में स्वर्ण कुण्डल झिलमिला रहे हैं। [3]
उनकी तिरछी चितवन मन को पंगु करने वाली है, और उनकी गजनायक चाल अति अद्भुत है। [4]
करू मन, नंदनँदनको ध्यान। [1]
यहि अवसर तोहिं फिर न मिलैगौ, मेरौ कह्यौ अब मान॥ [2]
घूँघरवारी अलकैं मुखपै, कुंडल झलकत कान। [3]
नारायन अलसाने नैना, झूमत रूप निधान॥ [4]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, पद सिद्धान्त (9)
अरे मन, नन्दनन्दन श्री कृष्ण का स्मरण कर। [1]
हे मन, मुझे ध्यान से सुन, यह महान अवसर तुझको फिर से प्राप्त नहीं होगा। [2]
श्री कृष्ण के मुख पर उनके घुंघराले काले केश हैं और कानों में स्वर्ण कुण्डल झिलमिला रहे हैं। [3]
उनकी तिरछी चितवन मन को पंगु करने वाली है, और उनकी गजनायक चाल अति अद्भुत है। [4]

