कब मेरी सुधि करि हौ वृषभानु लड़ैती राधा - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (45)

कब मेरी सुधि करि हौ वृषभानु लड़ैती राधा - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (45)

कब मेरी सुधि करि हौ वृषभानु लड़ैती राधा। [1]
कोमल चित्त किशोरी प्यारी, करुणा सिंधु अगाधा॥ [2]
अधम उधारणि पतित पावनी, हरन सकल भव बाधा। [3]
धर्म कर्म तजि कोटि पाप किय, साधन कछू न साधा॥ [4]
टेर सुनत ऐसेहु पतितन की, विरमत नहिं पल आधा। [5]
भोरी अब सब भाँति भरोसौ, चरण कमल सौं बांधा॥ [6]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (45)

हे वृषभानु लाडिली श्री राधा, आप कब मेरा स्मरण करोगी? [1]
आप सरल-हृदया हो और अकारण दया की अथाह सागर हो। [2]
आप पतित जीवों को पावन करने वाली एवं उनका उद्धार करने वाली हो। कृपया मेरी उन सभी बाधाओं को दूर कर दीजिये जो मुझे आपकी कृपा पाने में बाधा है। [3]
मैंने सभी प्रकार के धर्म (वैदिक अनुष्ठान), कर्म को त्याग दिया है और अनन्त पाप किए हैं। मैं संपूर्ण साधनों से रहित हूँ। [4]
आप तो पतित जीवों की पुकार सुनकर तत्क्षण उनके कष्ट को दूर करने उपस्थित हो जाती हो। [5]
श्री भोरी सखी कहती हैं कि "हे राधा! मुझे आपके सिवा किसी और पर भरोसा नहीं है, इसलिए मैंने अपना पूरा विश्वास आपके चरण कमलों से बांध दिया है।" [6]