हमारी सब ही बात सुधारी।
कृपा करी श्री कुंजबिहारीनि, अरु श्री कुंज बिहारी।। [1]
राख्यो अपने वृंदावन में, जिहि ठाँ रूप उजारि। [2]
नित्य केलि आनंद अखंडित, रसिक संग सुखकारी।। [3]
कलह कलेस न ब्यापै इहि ठाँ, ठौर बिस्व से न्यारी। [4]
नागरीदासहिं जन्म जितायौ, बलिहारी बलिहारी।। [5]
- श्री नागरीदास, श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (115)
इस पद में नागरीदास कहते हैं कि अब तो श्री राधा कृष्ण ने कृपा करके हमारे जीवन की समस्त बिगड़ी बना दी। [1]
उन्होंने वृंदावन में मुझे रखा जो रूप उजागर (राधा कृष्ण रूप रस प्रकाशित करने वाली) ठौर है। [2]
इस निज धाम श्री वृंदावन में नित्य ही केली रस अखंडित धारा से बहता है, एवं उनके निज रसिकों का नित्य संग मिलता है। युगल सरकार की कृपा से रसिकों के संग से उन्होंने केलि रस पान किया। [3]
इस धाम में किसी भी प्रकार का कलह व कलेश व्याप्त नहीं है इसलिए यह ठौर विश्व से न्यारी है। वृन्दावन धाम जैसा धाम कहीं नहीं है। [4]
श्री नागरीदास जी भाव विभोर होकर बार बार बलिहारी जाते हुए कहते हैं कि उनका जनम सफल हो गया है। [5]
कृपा करी श्री कुंजबिहारीनि, अरु श्री कुंज बिहारी।। [1]
राख्यो अपने वृंदावन में, जिहि ठाँ रूप उजारि। [2]
नित्य केलि आनंद अखंडित, रसिक संग सुखकारी।। [3]
कलह कलेस न ब्यापै इहि ठाँ, ठौर बिस्व से न्यारी। [4]
नागरीदासहिं जन्म जितायौ, बलिहारी बलिहारी।। [5]
- श्री नागरीदास, श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक पद (115)
इस पद में नागरीदास कहते हैं कि अब तो श्री राधा कृष्ण ने कृपा करके हमारे जीवन की समस्त बिगड़ी बना दी। [1]
उन्होंने वृंदावन में मुझे रखा जो रूप उजागर (राधा कृष्ण रूप रस प्रकाशित करने वाली) ठौर है। [2]
इस निज धाम श्री वृंदावन में नित्य ही केली रस अखंडित धारा से बहता है, एवं उनके निज रसिकों का नित्य संग मिलता है। युगल सरकार की कृपा से रसिकों के संग से उन्होंने केलि रस पान किया। [3]
इस धाम में किसी भी प्रकार का कलह व कलेश व्याप्त नहीं है इसलिए यह ठौर विश्व से न्यारी है। वृन्दावन धाम जैसा धाम कहीं नहीं है। [4]
श्री नागरीदास जी भाव विभोर होकर बार बार बलिहारी जाते हुए कहते हैं कि उनका जनम सफल हो गया है। [5]

